यह लेख द हिन्दू में 28 अक्टूबर 2020 को प्रकाशित लेख “इंडिया’स आउटरीच टू म्यांमार” नामक सम्पादकीय से लिया गया है

- हाल ही ,में विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रींगला और थल सेनाध्यक्ष मनोज नरवणे म्यांमार की यात्रा पर थे। उनकी ये यात्रा भारत और म्यंमार के द्विपक्षीय रिश्तों के मद्देनज़र काफी अहम् थी।
- गौरतलब है की म्यांमार में आगी आने वाले दिनों में आम चुनाव होने हैं।
- इस यात्रा से भारत म्यांमार के रिश्तों में गर्माहट आएगी साथ ही सीमा पर चल रही तनाव को कम करने के मद्देनज़र भी ये यात्रा काफी अहम् मानी जा रही है।
- भारत की इस यात्रा से म्यांमार भी आने वाले चुनावों मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों के बीच प्रजातांत्रिक मूल्यों को वापस बहाल करने का सन्देश देना चाहता है।
- भारतीय शिष्ट मंडल ने म्यांमार की कौंसिलर औंग सान सू की और म्यांमार के वरिष्ठ सेना प्रमुख जनरल मिन औंग हैंग से मुलाकात की।
साल 1990 से लेकर भारत म्यांमार के घनिष्ठ संबंधों के पीछे सिर्फ एक ही वजह है यहां भारत द्वारा प्रजातान्त्रिक मूल्यों को बहाल करने के लिए प्रयासरत रहना। इसकी वजह से भारत ने म्यांमार की सेना के साथ मिलकर म्यांमार में सत्ता हस्तांतरण में अहम् भूमिका निभाई। सेना के साथ अच्छे रिश्ते होनेकी वजह से भारत के हमेशा से ही म्यंमार के साथ अच्छे रिश्ते रही हैं चाहे वो सेना समर्थित 2010 में चुनी गयी यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी रही हो या प्रजातंत्र का समर्थन करने वाली नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी जो अभी सत्ता में है।
- म्यांमार में लोकतंत्रीकरण के भूराजनैतिक समीकरणों से भारत भी वाक़िफ़ है।
- म्यांमार में हुए राजनैतिक संक्रमण के चलते म्यांमार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन चुनौतियों में सबसे बड़ी चुनौती है पश्चिमी देशों के साथ म्यांमार के रिश्तों में दूरी।
- हालांकि म्यांमार को बाकी देशों और पश्चिम से जोड़ने के लिए भारत और कुछ एशियाई देशों ने अपनी पूरी कोशिश की है।
- सैन्य शासन द्वारा किये गए सुधारों की मुहिम के पीछे सबसे बड़ी वजह थी चीन से निर्भरता को कम करना।
- भारत का म्यांमार से वापस सम्बन्ध बहाल करने के पीछे सबसे बड़ी वजह है म्यनमार को चीन से दूर करना।
- तेज़ी से बदलते भूराजनैतिक समीकरणों के चलते भारत की इस रणनीति के कई अहम् मायने हैं।
- बाकी पड़ोसी देशों की ही तरह भारत म्यांमार में भी अपनी परियोजनाओं और घोषणाओं की प्रतिबद्धता समय पर न पूरी कर पाने की खराब छवि का शिकार है।
- इसकी वजह से ही भारत इन देशों में अपनी मौज़ज़ूदगी दर्ज़ करा पाने में सफल नहीं हो पाया है इसके मुकाबले चीन ने सभी परियोजनाओं को समय रहते पूरा किया है।
- विदेश सचिव और थल सेना प्रमुख की इस यात्रा से शायद यही छवि सुधारने की कोशिश की जा रही है।
- इस यात्रा के ज़रिये कई ऐसे राजनैतिक रक्षा और कूटनीतिक संबंधों को बहाल करने पर ज़ोर दिया जौएगा जिन्हे अभी तक भारत ने दरकिनार कर रखा था।
- नपी दाव में स्थित भारतीय दूतावास में संपर्क कार्यालय का उद्घाटन इसी पहल का एक हिस्सा माना जा रहा है।
- यहां पर यह दिलचस्प है की चीन ऐसा पहला देश था जिसने साल 2017 में ने पे दाव में पहला संपर्क कार्यालय स्थापित किया था।
- भारत ने म्यांमार में एक पेट्रोलियम रेफाइनरी बनाने का भी मसौदा तैयार किया है जिसमे कुल निवेश 6 बिलियन डॉलर के आस पास है।
- इससे ये पता चलता है की म्यांमार की भारतीय ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में कितनी दिलचस्पी है।
- यह इस बात का भी सूचक है की भारत चीन के बढ़ते प्रभाव से भी चिंतित है और ये कदम चीन के हालिया सीमा पर बढ़ते तनाव के मद्देनज़र भी उठाये गए हैं।
- सहयोग का एक दूसरा क्षेत्र जहां भारत म्यांमार सहयोग दिखाई देता है वो है सीमा पर विकास। दिल्ली और म्यांमार दोनों सीमा वर्ती इलाकों में विकास को लेकर कटिबद्ध हैं।
- सीमा पर विकास की सबसे बड़ी वजह है यहां की सुरक्षा और इसमें किये गए प्रयास साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे हैं।
- हाल ही में भारत द्वारा म्यांमार को किलो क्लास सबमरीन देने की घोषणा से ये पता चलता है की दोनों देशों के बीच सागरीय क्षेत्र में भी सहयोग की नयी इबारतें लिखी जा रही हैं।
- अंत में बांग्लादेश और म्यांमार के रिश्तों में अगर भारत को संतुलन कायम करना है तो इसके लिए ज़रूरी है की वो रोहिंग्याओं के मसले को कैसे हल करता है।
- भारत ने इस बात पर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है की निर्वासित रोहिंग्याओं को सुरक्षित वापस म्यांमार भेजना उसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है।
- रोहिंग्या शरणार्थियों को सुरक्षित म्यांमार पहुंचाने को लेकर दिए गए बयान से भारत ने न सिर्फ म्यांमार के प्रयासों को और मज़बूत किया है बल्कि इससे बांग्लादेश में भी प्रवासियों की वजह से बढ़ रहा दबाव कम करने में भी मदद मिलेगी।
- इसके अलावा भारत के लिए म्यांमार सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं है बल्कि म्यांमार वो कुंजी है जिसके ज़रिये भारत दाक्षि पूर्व एशिया और दक्षिणी एशिया के बंद दरवाज़े खोल सकता है।