मीथेन उत्सर्जन (Methane emissions) में कटौती: अमेरिका और यूरोपीय संघ का संयुक्त प्रयास

चर्चा में क्यों?
- संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ इस दशक के अंत तक ग्रह ऊष्मन के लिए ज़िम्मेदार गैस मीथेन के उत्सर्जन में लगभग एक तिहाई की कटौती करने के लिए सहमत हुए हैं और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को उनसे जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
मुख्य बिंदु
- ये समझौता नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन के मद्देनज़र होने वाले वैश्विक शिखर सम्मेलन के पूर्व विश्व की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं को वाशिंगटन और ब्रुसेल्स द्वारा इस मुहीम में जोड़ने के लिहाज़ से अहम् माना जा रहा है।
- इस मुहीम का ऊर्जा कृषि और अपशिष्ट उद्योगों पर अच्छा खासा प्रभाव पड़ सकता है। गौर तलब है की ये सभी क्षेत्र मीथेन के उत्सर्जन में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
- ग्रीनहाउस गैस मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के बाद जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण है।
- दुनिया की सरकारों द्वारा ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री तक सीमित करने के लिए समाधान के तहत मीथेन के उत्सर्जन को कम करना बेहद ज़रूरी है।
- आपको बता दे की ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री तक सीमित करना पेरिस जलवायु समझौते का एक लक्ष्य है।
वैश्विक मीथेन प्रतिज्ञा
- वैश्विक मीथेन प्रतिज्ञा के एक मसौदे के अनुसार, कार्रवाई शुरू करने के प्रयास में, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ इस सप्ताह के अंत में 2020 के स्तर की तुलना में 2030 तक मानव-जनित मीथेन उत्सर्जन को कम से कम 30% तक कम करने के लिए एक संयुक्त प्रतिज्ञा करेंगे।
- मसौदे में कहा गया है, “मीथेन के कम वायुमंडलीय जीवनकाल का मतलब है कि अब कार्रवाई करने से वैश्विक ऊष्मन की दर में तेजी से कमी आ सकती है।
- अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा दो दर्ज़न से ज़्यादा देशों को इस मुहीम में शामिल करने के लिए लक्षित किया गया है जिसे एक अलग दस्तावेज़ में सूचीबद्ध किया गया है।
- इन लक्षित देशों में सबसे बड़े उत्सर्जक देशों को सम्मिलित किया गया है जिनमे चीन रूस भारत ब्राज़ील और सऊदी अरब जैसे देश शामिल हैं।
- इसके अलावा इस सूची में नॉर्वे क़तर ब्रिटेन न्यूज़ीलैण्ड और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को भी शामिल किया गया है
- 17 सितम्बर को बड़ी उत्सर्जक अर्थव्यवस्थाओं की बैठक के दौरान इस समझौते को मूर्त रूप दिया जा सकता है।
- इस समझौते का मकसद ग्लासगो में होने वाली COP 26 की शिखर बैठक से पूर्व सभी बड़ी अर्थव्यस्थाओं का समर्थन जुटाना है।
- विश्व के सभी बड़े नेता वैज्ञानिकों , पर्यावरणीय समर्थकों के दबाव के चलते ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए बड़े महत्वाकांक्षी कदम उठा सकते हैं
मीथेन उत्सर्जन
जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल की एक रिपोर्ट के अनुसार :
- मीथेन गैस में कार्बन डाई ऑक्साइड के मुकाबले ज़्यादा ऊष्मा अवशोषित करने की क्षमता होती है लेकिन मीथेन गैस वायुमंडल में तेज़ी से विघटित हो जाती है।
- मिथेन की मात्रा में तीव्र वृद्धि के बावजूद वैज्ञानिक कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि की तुलना में इसकी वृद्धि से कम चिंतित है।
- इसका प्रमुख कारण यह है कि कार्बन डाईऑक्साइड वायुमंडल में दीर्घकाल तक ज्यों का त्यों रहता है। यह 50 से लेकर 200 वर्षों तक अस्तित्व में रहता है।
- इसका तात्पर्य यह हुआ कि यदि वायुमंडल में एक बार कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि होती है तो फिर उसे कम करना कठिन हो जाता है।
- वहीं दूसरी ओर रसायनिक प्रतिक्रियाओं द्वारा मिथेन 12-17 वर्ष में नष्ट हो जाता है। अतः मिथेन से होने वाली संभावित क्षति को कम करना आसान है।
मीथेन उत्सर्जन कम करने के प्रयास
- जानकारों का कहना है की जीवाश्म ईंधन क्षेत्र के ज़रिये इस दशक में मीथेन उत्सर्जन को कम किये जानी की संभावना ज़्यादा है।
- इस उत्सर्जन को रिसाव वाली पाइपलाइन या गैस भण्डारण सुविधाओं को ठीक करके कम कीमत में कम किया जा सकता है।
- इन सबके बावजूद हालिया सालों में उपग्रह से प्राप्त चित्रों और इंफ्रारेड फुटेज से ये पता चला है की यूरोपीय संघ मेक्सिको और अमेरिका समेत कई देशों में तेल और गैस स्थलों से अभी भी मीथेन का उत्सर्जन जारी है।
- हालांकि अमेरिका और यूरोपीय संघ दोनों ही इस साल मीथेन उत्सर्जन को रोकने के लिए कानून बनाने केलिए कटिबद्ध हैं।
- मसौदे में कहा गया है कि अमेरिका यूरोपीय संघ द्वारा ली जा रही प्रतिज्ञा में रिसाव तेल और गैस बुनियादी ढांचे, पुरानी कोयला खानों, कृषि और कचरे जैसे कचरे सहित मीथेन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों को शामिल किया जाएगा।
आगे की राह
- प्रतिज्ञा में शामिल होने वाले देश सामूहिक रूप से मीथेन कटौती के लक्ष्यको प्राप्त करने के लिए घरेलू कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध होंगे।
- इन कार्रवाईओं में ऊर्जा और अपशिष्ट क्षेत्रों में सभी संभव कटौती को प्राप्त करने के लिए मानकों पर ध्यान केंद्रित करना, प्रौद्योगिकी नवाचार के साथ-साथ प्रोत्साहन और किसानों के साथ भागीदारी के माध्यम से कृषि उत्सर्जन को कम करना जैसे कदम शामिल होंगे।