
हाल ही में, देश के आठ समुद्री बीचेज यानी तटों को प्रतिष्ठित ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेशन प्राप्त हुआ है।
अब भारत दुनिया के उन 50 देशों में शुमार हो गया है, जिनके पास ब्लू फ्लैग दर्जे वाले स्वच्छ समुद्री तट मौजूद हैं। इसके अलावा, भारत को तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए ‘इंटरनेशनल बेस्ट प्रैक्टिस’ के अंतर्गत तीसरे पुरस्कार के लिए भी चुना गया है।
- ‘ब्लू फ्लैग’ किसी भी समुद्री तट यानी बीच को दिया जाने वाला एक ख़ास क़िस्म का प्रमाण-पत्र होता है.
- यह ‘फ़ाउंडेशन फॉर इनवॉयरमेंटल एजुकेशन’ नाम के एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन द्वारा दिया जाता है। इस संगठन का मक़सद पर्यावरणीय जागरुकता के ज़रिए सतत विकास को बढ़ावा देना है।
- डेनमार्क के कोपनहेगन शहर स्थित इस संगठन द्वारा ‘ब्लू फ्लैग’ सर्टिफ़िकेट की शुरुआत साल 1985 में की गई थी।
- ‘ब्लू फ्लैग’ सर्टिफिकेशन के अलावा इस संस्था ने चार और कार्यक्रम चला रखे हैं – जिनमें इको-स्कूल्स, यंग रिपोर्टर्स फॉर द एनवायरनमेंट, लर्निंग फॉर फॉरेस्ट और ग्रीन की इंटरनेशनल शामिल हैं।
ब्लू फ्लैग मानकों के तहत समुद्र तट को पर्यावरण और पर्यटन से जुड़े 33 शर्तों को पूरा करना होता है। इन शर्तों को चार व्यापक वर्गों में बाँटा गया है, जिनमें
(i) पर्यावरण शिक्षा और सूचना
(ii) नहाने वाले पानी की गुणवत्ता
(iii) पर्यावरण प्रबंधन और
(iv) सुरक्षा समेत अन्य सेवाएं शामिल हैं।
अगर किसी समुद्री तट को ब्लू फ्लैग का सर्टिफिकेट मिल जाता है तो इसका मतलब वो बीच प्लास्टिक मुक्त, गंदगी मुक्त और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन जैसी सुविधाओं से लैस है। साथ ही, वहां आने वाले सैलानियों के लिए साफ पानी की मौजूदगी, अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक पर्यटन सुविधाएँ और समुद्र तट के आसपास पर्यावरणीय प्रभावों की जानकारी जैसी सुविधाएँ भी चुस्त-दुरुस्त होनी चाहिए।
- भारत ने ‘ब्लू फ्लैग’ मानकों के मुताबिक अपने समुद्र तटों को विकसित करने का पायलट प्रोजेक्ट दिसंबर 2017 में शुरु किया था।
- इस प्रोजेक्ट के तहत सभी तटीय राज्यों से 13 समुद्री तटों को ‘ब्लू फ्लैग’ सर्टिफिकेट के लिये चुना गया है। इस परियोजना के दो मूल मक़सद हैं। पहला, भारत में लगातार गंदगी और प्रदूषण के शिकार होते समुद्र तटों को इस समस्या से निजात दिलाकर इनका पर्यावास दुरुस्त करना और दूसरा, सतत विकास और पर्यटन सुविधाओं को बढ़ाकर भारत में इको फ्रेंडली पर्यटन विकसित करना है।
- भारत दुनिया का पहला ऐसा देश है जिसने एक ही बार में अपने 8 बीचेज के लिए ‘ब्लू फ्लैग’ दर्जा हासिल किया है। साथ ही, भारत एशिया-पैसेफिक क्षेत्र में महज 2 साल के अंदर ब्लू फ्लैग दर्जा हासिल करने वाला पहला देश भी बन गया है।
- साल 2018 में पर्यावरण मंत्रालय ने देश के 13 समुद्री तटों को ब्लू फ्लैग के लिए चिह्नित किया था। इनमें से 8 तटों के नाम 18 सितंबर को भेजे गए थे, जिन्हें निर्धारित मानकों पर पूरी तरह खरा पाया गया।
- इन आठ समुद्री तटों को एक इंटरनेशनल ज्यूरी ने ब्लू फ्लैग के लिए चुना है। इस ज्यूरी में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी UNEP, संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन यानी UNTWO, फाउंडेशन फॉर एनवायरमेंटल एजुकेशन यानी FEE और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर यानी IUCN जैसे प्रतिष्ठित संगठनों के सदस्य शामिल थे।
- एशिया में अब तक महज जापान, दक्षिण कोरिया और यूएई के तट ही इस सूची में मौजूद थे. इस फ़ेहरिस्त में शामिल होने वाला भारत अब चौथा देश बन गया है.
- जिन आठ तटों को ब्लू फ्लैग दर्जा हासिल हुआ है उनमें गुजरात का शिवराजपुर बीच, ओडिशा का गोल्डन बीच, दीव का घोघाला बीच, कर्नाटक के पादुबिदरी बीच और कासरकोड बीच शामिल है. इसके अलावा, इस सूची में केरल का कप्पड़ बीच, आंध्र प्रदेश का रुशिकोंडा बीच, और अंडमान एवं निकोबार दीप समूह का राधानगर बीच भी शुमार हैं। उड़ीसा के कोणार्क तट पर मौजूद चंद्रभागा बीच ‘ब्लू फ्लैग’ टैग पाने वाला भारत का पहला बीच है।
- भारत में, समुद्री तटों को ‘ब्लू फ्लैग’ के मानकों के मुताबिक विकसित करने का काम ‘सोसायटी फॉर इंटीग्रेटेड कोस्टल मैनेजमेंट’ यानी SICM नाम की संस्था कर रही है। SICM पर्यावरण मंत्रालय के मातहत काम करती है।
- समुद्र तटों को पर्यावरण हितैषी बनाने के लिये ब्लू फ्लैग कार्यक्रम को फ्रांस के पेरिस से शुरू किया गया था और लगभग दो साल के भीतर ही यूरोप के क़रीब सारे समुद्र तटों को इस तमगे से लैस कर दिया गया।
- साल 2001 में इसका दायरा दक्षिण अफ्रीका तक पहुंच गया, हालांकि एशिया महाद्वीप में अभी तक इस तरह के बीचेज नहीं थे। मौजूदा वक्त में, ब्लू फ्लैग सूची में स्पेन पास दुनिया में सबसे ज्यादा 566 समुद्र तट हैं, जबकि ग्रीस के 515 और फ्रांस के 395 तटों को यह दर्जा मिला हुआ है।